भारत: वर्तमान एवं भविष्य
गुरुवार, 30 जनवरी 2014
मंगलवार, 14 जनवरी 2014
'आप' सरकार- एक नई उर्जा
विश्व राजनीति के इतिहास में शायद ऐसा प्रथम बार ही हुआ है की एक वर्ष से कम आयु की एक नई राजनितिक पार्टी ने चुनाव लड़ा और जीत कर सरकार बनाई| 'आप' के द्वारा दिल्ली में सरकार बनाना कई तरह से एक उपलभ्दी है| यह एक नई राजनितिक पहल है जिसने आम लोगों में एक नई उर्जा का संचालन किया है और उनकी अनेक निराशाओं को दूर करने का भरोसा दिलाया है| सरकारी तंत्र से निराश हो चुके लोगों में एक नई उमंग का संचार हुआ है| दूसरी और यह पुरानी राजनितिक पार्टियों और नौकरशाही को साफ़ संकेत है की लोग उनके तौर तरीकों से तंग आ चुके हैं| वे अपनी उपेक्षा और सहन नहीं कर सकते| लोग यह भी समझने लगे हैं की इस तंत्र को बदलने का समय आ चूका है और 'आप' को मजबूत समर्थन दे कर वे यह कर सकते हैं|
'आप' का दिल्ली में सरकार बनाना जहाँ एक और पुरानी पार्टियों के लिए राजनितिक भूकम्प है, वहीँ दूसरी और यह एक नई राजनीति की शुरुआत है जो पूर्णतया ईमानदारी, पारदर्शिता और अस्वार्थ के स्तंभों पर आधारित है| 'आप' अपने मूलभूत सिद्धांतों पर कितना रह पाती है यह तो समय ही बतायेगा परंतु लोगों ने एक नई सोच को सत्ता सोंप कर यह साफ़ कर दिया है की पुराने ढर्रे को बदलना चाहते हैं|
सरकार बनने के उपरान्त 'आप' पर मीडिया और आलोचकों के पैनी नज़र होना स्वाभाविक है| सभी यह देखना चाहते हैं की साफ़ राजनीति कैसे की जा सकती है क्योंकि यह अब तक असंभव ही माना जाता रहा है| ऐसे में 'आप' को एक एक कदम फूँक फूँक कर रखना पड़ेगा और समझदारी से निर्णय लेने पड़ेंगे| व्यवस्था को बदलने के लिए कुछ नए प्रयोग करने पड़ेंगे जो असफल भी हो सकते हैं किन्तु असफलता के दर से उनका प्रयोग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए| इसे ही कुछ असफल प्रयोग हाल ही में हुए हैं जिन पर मीडिया सहित कई लोगों ने चुटकी ली है परन्तु 'आप' को इससे विचिलित नहीं होना है बल्कि इनसे सीख लेनी चाहिए|
'आप' का दिल्ली में सरकार बनाना जहाँ एक और पुरानी पार्टियों के लिए राजनितिक भूकम्प है, वहीँ दूसरी और यह एक नई राजनीति की शुरुआत है जो पूर्णतया ईमानदारी, पारदर्शिता और अस्वार्थ के स्तंभों पर आधारित है| 'आप' अपने मूलभूत सिद्धांतों पर कितना रह पाती है यह तो समय ही बतायेगा परंतु लोगों ने एक नई सोच को सत्ता सोंप कर यह साफ़ कर दिया है की पुराने ढर्रे को बदलना चाहते हैं|
सरकार बनने के उपरान्त 'आप' पर मीडिया और आलोचकों के पैनी नज़र होना स्वाभाविक है| सभी यह देखना चाहते हैं की साफ़ राजनीति कैसे की जा सकती है क्योंकि यह अब तक असंभव ही माना जाता रहा है| ऐसे में 'आप' को एक एक कदम फूँक फूँक कर रखना पड़ेगा और समझदारी से निर्णय लेने पड़ेंगे| व्यवस्था को बदलने के लिए कुछ नए प्रयोग करने पड़ेंगे जो असफल भी हो सकते हैं किन्तु असफलता के दर से उनका प्रयोग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए| इसे ही कुछ असफल प्रयोग हाल ही में हुए हैं जिन पर मीडिया सहित कई लोगों ने चुटकी ली है परन्तु 'आप' को इससे विचिलित नहीं होना है बल्कि इनसे सीख लेनी चाहिए|
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